सोमवार, 10 मई 2021

माँ ने कभी नहीं कहा ..

 


माँ ने कभी  नहीं कहा .. 

गृहस्थी की ढेरों जिम्मेदारियाँ निभाते हुए 

सुबह -सवेरे सपनों की धुन पर 

खिलते -कुम्हलाते हमारे माथे पर

 प्रेम का बोसा ले जगाते हुए 

भक्ति और वैराग्य के भजन गुनगुनाते हुए 

हमारी शैतानियों से परेशान हो बड़बड़ाते हुए 

जीवन की अनगिनत परेशानियों पर 

हमारा संबल बन हमे तारते हुए  

या कभी गंभीर -बेहद गंभीर बीमार पड़ने पर भी 

माँ ने कभी नहीं कहा 

कि तब पता चलेगा जब मैं नहीं रहूँगी ?

शायद वो उन पलों में 

हमारी आँखों में उभर आए 

 दर्द और रिक्तता का  बोध 

नहीं देखना चाहती थीं 

या सोचती थी 

झेलना ही है एक बार 

झेल लेंगे मेरे बच्चे भी 

जैसे झेलती है पूरी दुनिया 

विधाता की इस अदृश्य कुल्हाड़ी का वार 

तो क्यों अभी से दिल दुखाना 

या वो जानती थीं 

इस सत्य को 

कि माँ 

कभी  जाती नहीं 

कहीं जाती नहीं 

सासंसारिक नियम में जाने की उस घड़ी के बाद 

उतर आती है 

पूरी की पूरी 

शायद इसीलिए तुम्हारे जाने के बाद माँ 

मेरे बच्चों अक्सर कहते हैं 

मम्मी तुम नानी जैसी होती जा रही हो 

आह !  इस कस्तूरी को समेटे 

मैं हँसती हूँ, रोती हूँ , व्यथित होती हूँ 

जड़वत एक स्थान पर बैठ 

मीलों भागती हूँ स्मृतियों के जंगल में 

छूना चाहती हूँ 

वो मुलायम  हाथ 

वो पुलपुले गाल 

और हम सब को बेहद प्यारा  

वो थोड़ा सा टूटा आगे वाला दाँत 

पर मृगमारीचिका सी कभी  नहीं मिटती 

वो अतृप्त प्यास 

और मैं थोड़ी सी और बदल जाती हूँ माँ में 

हर बार 

थोड़ी सी और ...

और हाँ ! 

मैंने भी कहना छोड़ दिया है  अपने बच्चों से 

एक दिन जब मैं नहीं होऊँगी तब ..

क्योंकि

 माँ ने कभी  नहीं कहा  था ....

वंदना बाजपेयी 

 



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